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Download Districts of Rajasthan: Zila Darshan Tonk | rasnotes.com

Download Districts of Rajasthan: Zila Darshan Tonk

जिला दर्शन : टोंक 


टोंक शहर राजस्थान की राजधानी जयपुर की दक्षिण दिशा में 95 कि.मी. की दूरी पर पश्चिम से पूर्व दिशा में बहती प्रसिद्ध बनास नदी से दक्षिण की ओर तथा जयपुर-कोटा राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे (जिला मुख्यालय) स्थित है। मध्यकाल में मुगल साम्राज्य के सम्राट अकबर के शासनकाल में जयपुर के राजा मानसिंह ने टारी और टोंकरा नामक जिलों को अपने अधिकार में लिया और टोंकरा के बारह गांव केभोला नामक ब्राह्मण को सन् 1643 में भूप के रूप में स्वीकार किया। उसके बाद में बारह ग्राम समूहों को एक सूत्र में बांधकर उसक नामकरण ’टोंक’ किया। 

भौगोलिक स्थिति


टोंक जिला राजस्थान के उत्तरी-पूर्वी भाग में 25.41’ से 26.24’ उत्तरी अक्षांश तथा 75.19' से 76.16 अक्षांश पूर्वी देशान्तर के मध्य स्थित है। जिले के उत्तर में जयपुर, दक्षिण में बूंदी एवं भीलवाड़ा, पश्चिम में अजमेर एवं पूर्व में सवाईमाधोपुर जिला है। 
समुद्रतल से यह जिला 364.32 मीटर की ऊंचाई पर है। इसका क्षेत्रफल 7,194 वर्ग किलोमीटर है। यहां की औसत वर्षा 600 मिलीमीटर है। वर्षा के दिनों में रौद्र रूप धारण कर पश्चिम से पूर्व दिशा में बहती प्रसिद्ध बनास नदी जिले को उत्तर वं दक्षिण भागों में बांटती है। जिले की काली मिट्टी उपजाऊ एवं धरातल समतल है। 
जिले में अरावली पहाड़ियां हैं। इसकी एक श्रृंखला दक्षिण स्थित राजकोट से उत्तर-पूर्व में बनेठा होते हुये सवाई माधोपुर जिले में जाती है। दूसरी श्रृंखला टोडारायसिंह से राजमहल तक है जहां बनास नदी ने पहाड़ी को चीर कर मार्ग बनाया है। यहां सिंचाई एवं पेजयल पूर्ति के लिये बीसलपुर बांध का निर्माण किया गया। एक ओर पहाड़ी मालपुरा के समीप है जो समुद्रतल से 852 मीटर ऊंची है। 
विशालकाय प्रसिद्ध बनास नदी का उद्गम दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी बहुल क्षेत्र गोगुन्दा से हुआ है। यह अरावली की पूर्वी श्रृंखलाओं के बीच बहती हुई टोंक, सवाईमाधोपुर जिलों से चम्बल नदी में समा जाती है। टोडारायसिंह बीसलपुर गांव पर दो पहाड़ियों को जोड़कर बीसलपुर बांध बनाय गया जो जिले की सबसे बड़ी जल परियोजना है। 
बनास नदी के अतिरिक्त उनियारा तहसील क्षेत्र में गलवा नदी पर गलवा बांध, अजमेर जिले से निकली मासी नदी पर मासी बांध का निर्माण किया गया जो सिंचाई एवं जलापूर्ति के काम आता है। डाई, श्योदरा, बांडी इत्यादि जिले की सहायत नदियां है। 

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि


जिले के टोंक, मालपुरा, लावां, उनियारा व टोडारायसिंह आदि कई स्थान विशेष महत्व रखते हैं। जिले का कोई क्रमबद्ध इतिहास नहीं है। यत्र-तत्र बिखरे प्राचीन शिलालेख, ध्वसांवशेष, सिक्कों आदि से ही प्राचीन इतिहास के तथ्य उजागर होते हैं। 
यह क्षेत्र महाभारतकाल में संवादलक्ष था। मौर्यकाल में यह मौर्य शासकों के अधीन था जिसे बादम में मालव गणराज्य में मिला दिया गया। विक्रमी संवत् से पूर्व शताब्दी के सिक्के उनियारा ठिकाने के प्राचीन खण्डहरों से मिले थे, जिस पर मालवती जय तथा जय मालव गणराज्य अंकित है। 

हर्षवर्धन के गणराज्य में इस क्षेत्र का एक बड़ा भाग सम्मिलित था। चीनी यात्री ह्वेनसांग के अनुसार तत्कालीन क्षेत्र के चारों भागों में से एक यह क्षेत्र बैराट प्रदेश के अन्तर्गत था। 
राजपूत शानकाल में टोंक जिले का बड़ा भाग कई खण्डों में चावंडा, सोलंकी, कछवाह, सिसोदिया एवं चैहान आदि राजपूतों के अधीन रहा और कई स्थानों पर उनकी राजधानियां रहीं। बाद में जयपुर, होल्कर और सिंधिया का इस क्षेत्र के बडे़ भाग पर शासन रहा। 
सन् 1806 में बनास नदी के उत्तरी भाग पर बलवन्त राव होल्कर से पिंडारियों के सरदार अमीर खां ने कब्जा कर लिया जिसे बाद में ब्रिटिश सैनिकों ने जीत लिया। सन् 1817 की संधि के अनुसार यह क्षेत्र अमीर खां को लौटा दिया गया जिसने बाद में टोंक रियासत की स्थापना की। 
वर्तमान राजस्थान निर्माण में टोंक 9 रजवाड़ों में से एक था। इस प्रकार यह जिला भूतपूर्व टोंक, बूंदी एवं जयपुर रियासतों और अजमेर-मेरवाड़ी की मिश्रित संस्कृति का परिचायक है। 

प्रशासनिक ढांचा 

प्रशासनिक दृष्टि से टोंक जिले में 7 उपखण्ड - टोंक, उनियारा, निवाई, मालपुरा, पीपलू, टोडारायसिंह व देवली हैं तथा 6 पंचायत समितियां टोंक, अलीगढ़, निवाई, मालपुरा, टोडारायसिंह व देवली है। जिले में 8 तहसीलें तथा एक टोंक नगर परिषद है। जिले में 231 ग्राम पंचायतें तथा 1182 गांव है। यहां अरबी एवं फारसी शोध संस्थान, कृषि प्रशिक्षण केन्द्र आदि भी है।

भूमगढ़ (टोंक)


17वीं शताब्दी में ब्राह्मण भोला ने अपनी भोम की रक्षा एवं प्रशासन की दृष्टि से भूमगढ़ का निर्माण कराया जिसे नवाब अमीर खां ने पूरा कराया। इसके चारों ओर परकोटे भी हैं।
इसे अमीरगढ़ किला भी कहा जाता है। इस किले के समीप खुदाई में जैन तीर्थंकरों की पाषाण निर्मित अति प्राचीन और 26 सुन्दर प्रतिमाएं मिली हैं। इनको टोंक नसियां में ही प्रतिष्ठापित किया गया है। 

डिग्गी श्री कल्याणजी 


जयपुर से 80 किलोमीटर दूर डिग्गी श्री कल्याणजी का प्राचीन मंदिर स्थित है। पौराणिक गाथाओं के अनुसार श्री कल्याणजी की प्रतिमा बाहर से लाई गई है। वर्तमान में डिग्गी एक तीर्थ स्थल माना जाता है। यहां प्रत्येक एकादशी को दर्शनार्थी भारत के कोने-कोने से आते हैं और मिन्नतें करते हैं। मुख्य मेला प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ला एकादशी को लगता है। श्री कल्याणजी की पूजा-अर्चना के उक्त अवसरों पर समूहों में अनेक भक्तगण दूर-दूर से कनक दण्डवत करते हुये आते हैं और दर्शन करते हैं। 

राजमहल 


यहां का राजमहल पर्यटकों को लुभाने वाला एवं प्राकृतिक सुषमा से युक्त है। यह महल बनास नदी के किनारे पर स्थित है। यहीं इस नाम से एक गांव भी बस गया है। इस महल के पास बनास, डाई और खारी नदियों का त्रिकोण संगम है। यह स्थल पहले भी काफी प्रसिद्ध एवं चर्चित रहा है। 

यहीं पास में गोकर्णेश्वर महादेव, बीसलदेव का मंदिर आदि पौराणिक एवं धार्मिल स्थल है। वैशाख एवं कार्तिक पूर्णिमा को यहां मेले लगते हैं। यहां प्रकृति की गोद में अथाह पानी वाली सालमसिंह की दह में नौका विहार की सुविधा है। राज्य सरकार द्वारा राजमहल को पर्यटन के मानचित्र पर लाने के लिये चुना गया है। राजमहल को देखकर देश के नहीं बल्कि यूरोपिय एवं एशियाई देशों तथा इंग्लैण्ड, जर्मनी, पौलेण्ड, चीन, जापान, जावा एवं इण्डोनेशिया आदि देशों से आये पर्यटकों ने भी मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की है। 

माण्डकला (नगरफोर्ट)


देवली पंचायत समिति क्षेत्र के इस गांव में एक छोटे तालाब का ’पुष्कर’ के समान धार्मिक महत्व है। इसके चारों और 16 मंदिर है। यह स्थल माण्डव ऋषि की तपोस्थली रही है। यहां प्रतिवर्ष परम्परागत 15 दिवसीय विराट पशु मेला कार्तिक पूर्णिमा से प्रारम्भ होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार उक्त अवसर पर हजारों श्रद्धालु पाप से मुक्त एवं निरोग होने के लिये तालाब में स्नान करते हैं। 
माण्डकला से कुछ ही दूरी पर मुचकन्देश्वर महादेव मंदिर राजा मुचकन्द द्वारा बनाया गया था। मंदिर में प्रतिष्ठापित शिवालय में लगभग चार फीट ऊंचा शिवलिंग है। माण्डकला के पास दबा प्राचीन कस्बा ’नगर’ है जिसके प्राचीन महलों मंे विक्रम संवत् पूर्व की तीसरी शताब्दी के शिलालेख एवं सिक्के मिले हैं जिन पर ’मालवन्त जय’ और ’जय मालव गणराज्य‘ मुद्रित है। बीसलदेव के पास गोकर्णेश्वर महादेव का मंदिर है जो पहाड़ी की गुफा में है।

सुनहरी कोठी


टोंक बड़ा कुआं के पास नजर बाग में रत्न, कांच और सोने की झाल देकर बनाई गई सुनहरी कोठी अवस्थित है। पूर्व में यह शीशमहल के नाम से जानी जाती थी। यह अत्यन्त मनोहारी एवं दर्शनीय है। सुनहरी कोठी की दीवार एवं छतों में कांच, रत्न जड़ित सोने की बेल बूटियां, फूल, पच्चीकारी एवं मीनाकारी का कलात्मक स्वरूप आज भी आकर्षण का केन्द्र है।

ककोड़ का किला एवं हाथी भाटा


जिला मुख्यालय से सवाई माधोपुर सड़क पर 22 किलोमीटर दूर ककोड़ का गगनचुम्बी किला ऊंचे पहाड़ पर स्थित है। प्रातःकाल सूर्य की किरणों से सुभाषित महल आज भी अपनी भव्यता का परिचय देता पर्यटकों को आकर्षित करता है। ककोड़ का प्राचीन नाम कनकपुरा था। इसके पांच किलोमीटर पूर्व दिशा में ही गुमानपुरा गांव के चट्टान पर विशाल पत्थर को उत्कीर्ण कर हाथी बनाया गया है। उक्त पाषाण हाथी सवाई माधोपुर सड़क से गुजरते अथवा थोड़ी दूरी से देखते समय जीवित हाथी की तरह भागता हुआ प्रतीत है।
जिले में इसी प्रकार निवाई एवं चांदसेन के पहाड़ में भृंगौजी की गफा, बनेठा की पुरातात्विक महत्त्व की छतरियां, चतुर्भुज तालाब के पास दरियाशाह की बावड़ी, पुरानी टोंक स्थित कौमी एकता के प्रतीकात्मक मंदिर एवं मस्जिद, निवाई के गर्म एवं ठण्डे कुण्ड, बगड़ का मोहम्मदगढ़, मालपुरा का फूल पीर, कालेखां के तह, चितौड़ी पोल, दादाबाड़ी, टोरडी सागर बांध का रमणीक सथल, टोडारायसिंह की बावड़ियां, झांसी की रानी के महल, बुध सागर, पीपाजी का मंदिर एवं गुफा, बीसलपुर में बीसलदेवजी का मंदिर आदि ऐतिहासिक एवं धार्मिक स्थल है। 

अरबी एवं फारसी शोध संस्थान 


साहित्य सेवियों की तीर्थस्थली ’अरबी एवं फारसी शोध संस्थान’ की विधिवत् स्थापना 4 दिसम्बर, 1978 को की गई। इससे पूर्व सरकार द्वज्ञरा वर्ष 1961 में टोंक जिला मुख्यालय पर प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर का एक कार्यालय अरबी एवं फारसी भाषाओं पर शोध तथा उनके उन्नयन के लिये स्थापित किया गया था। सरकार द्वारा सन् 1983 में अलवर, जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, भरतपुर और झालावाड़ के सरकारी पुस्तकालयों या निजी संग्रहालयों से अरबी, फारीस एवं उर्दू गं्रथों का जखीरा हस्तान्तरित किया गया। 
नवाब मोहम्मद अली खां ने विशेषकर मिश्र एवं भरत के विभिन्न स्थानों से अनेक ग्रंथ एकत्रित किये। इस संस्थान में कार्यशालाओं द्वारा अनुसंधान कर शोध पत्र तैयार किये जाते हैं। 

वनस्थली विद्यापीठ 


वनस्थली विद्यापीठ की स्थापना वर्ष 1935 में राजस्थान में प्रथम मुख्यमंत्री स्व. हीरालाल शास्त्री ने की थी एवं इस प्रसिद्ध महिला शिक्षण संस्थान में आई.टी. सेन्टर की स्थापना की गई है। 

केन्द्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान 


भारत सरकार द्वारा अविकानगर (मालपुरा) में चार हजार एकड़ जमीन पर उक्त संस्थान की स्थापना की गई है। इस संस्थान में भेड़ों में ऊन विकास करने का वैज्ञानिक प्रयत्न किया जा रहा है। संस्थान में संकर प्रजनन के माध्यम से अविशास्त्र और अविकालीन नाम से भेड़ों की दो नस्लें तैयार की गई है। अविकानगर में भेड़ों के अतिरिक्त खरगोश प्रजाति का भी पालन-पोषण किया गया है। यहां के प्रति खरगोश से दो से तीन किलोग्राम मांस प्राप्त होता है। 

बीसलपुर 


बीसलपुर का नाम लेते ही पौराणिक और मध्यकाल के गौरवमय इतिहास के जन आस्थाओं से जुडे़ पन्ने खुलने लगते हैं। इस गांव के पास ही बनास नदी के दायें छोर पर अंकित अरावली की गुफा के अन्दर बने गोकणेश्वर महादेव मंदिर के शिवलिंग पर अंकित गाय के कान (गोकर्ण) ने इसकी महत्तता में बढ़ोतरी की है। 

स्थानीय जन मान्यता है कि यह गौकर्ण उस पौराणिक गाय का है जिसने पृथ्वी को अपने सींगों पर उठा रखा है। किंवदतियों के अनुसार इस पौराणिक गाय का दूसरा कान बद्रीनाथ के समीप हिमालय में स्थित शिवलिंग पर अंकित है। स्थानीय किंवदतियों के अनुसार महाबलि रावण ने इस शिव मंदिर में शिव की उपासना की थी। आज बीसलपुर आधुनिक राजस्थान के तीर्थस्थल के रूप में देखा जाता है। 

यहां बनास नदी पर विशाल बांध 315.05 मीटर का बनाया गया है। राज्य की एक बड़ी पेयजल योजना टोंक, जयपुर, अजमेर के लिये बनाई गई। इसके साथ ही बीसलपुर बांध से दो नहरें निकाली गई हैं, जो टोंक के 81 हजार 800 हैक्टर भूमि को सिंचित करेंगी। यह बांध पर्यटकों के लिये आकर्षण का केन्द्र बन गया है। 

प्रमुख मेले 


हमारे समाज में सदियों से मेलों की अनूठी परम्परा रही है। ये जनमानस की गहरी भावनात्मक आस्थाएं, लोक जीवन की झांकी ही नहीं बल्कि हमारी सांस्कृतिक एकता को भी एक सूत्र में पिरोये हुए हैं। जिले में विभिन्न स्थानों पर मेलों का आयोजन होता है। 
मालपुरा के पास डिग्गी में भाद्रपद शुक्ला एकादशी को श्री कल्याण एवं बीसलपुर में वैशाख की पूर्णिमा को एक-एक दिवसीय तथा पीपलू में ज्येष्ठ की अमावस्या को 15 दिवसीय, चांदसेन में रामनवमी को 7 दिवसीय और नगरफोर्ट माण्डव ऋषि की तपोस्थली स्थित धार्मिक पवित्र सरोवर पर 15 दिवसीय विराट पशु मेलों का आयोजन किया जाता है। इन मेलों में हजारों की संख्या में लोग सम्मिलित होते हैं। 

हस्तकला एवं उद्योग


नमदा उद्योग 


नमदों के साथ टोंक और मालपुरा का नाम जुड़ा हुआ है। जिले में नमदा बनाने का व्यवसाय पैतृक व्यवस्था के रूप में चला आ रहा है। टोंक एवं मालपुरा के तैयार नमदों ने काफी ख्याति अर्जित की है। नमदा देश-विदेश में निर्यात किया जा रहा है। नमदा आजकल गलीचे का स्थान ले चुका है। इसकी देश-विदेश में मांग निरन्तर बढ़ रही है। साईकिल की सीट से लेकर कमरों में बिछाने, टेबिल कांच के नीचे लगाने के अतिरिक्त बैठकों में दीवारों को सजाने तक में नमदों का इस्तेमाल होने लगा है। 
इस व्यवसाय के विस्तार में महिलाओं की भागीदारी अत्यधिक है। वे नमदे में विभिन्न डिजाइन और बेल-बूंटियों से आकर्षक स्वरूप देती है। इससे परिवारों में रोजगार के अवसर बढे़ हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से नमदा मूलतः मालपुरा में बनना शुरू हुआ। बाद में टोंक शहर अलीगढ़, उनियारा, बगड़ी इत्यादि में पिंजारा जाति के नमदागारों के अतिरिक्त अन्य लोगों द्वारा निर्मित किया जाने लगा। जिला ग्रामीा विकास अभिकरण द्वारा संचालित ड्वाकरा योजनान्तर्गत भी महिलायें नमदा उद्योग से लाभान्वित हो रही हैं। 

हथकरघा-वस्त्र बुनाई 


टोंक जिले में दरी, कपड़ा, ऊनी कम्बल एवं चद्दरों की बुनाई की जाती है। यहां की दरी एवं पर्दे कलात्मक एवं टिकाऊपर के लिये प्रसिद्ध हैं जिनका निर्यात किया जाता है। जिले में विभिन्न सहकारी संस्थाओं, खादी ग्रामोद्योग एवं खादी भण्डार द्वारा दीर एवं पर्दे बनाने का कार्य किया जाता है। इस समय यहां 350 इकाइयों में 6 हजार से अधिक व्यक्तियों को रोजगार मिला हुआ है। इसके अतिरिक्त डेढ़ हजार परिवार परम्परागत कपड़ा बुनाई के व्यवसाय में संलग्न है। 

चमडे़ का कार्य 


यहां चर्म दस्तकार सर्वाधिक है जो परम्परागत रूप से चमड़ा तैयार कर देशी जूतियां, आधुनिक चप्पल, सैंडिल और कृषि चर्म उपकरणों को तैयार करते हैं। वर्तमान में इस व्यवसाय ने वृहद् रूप से लिया है। चमड़ा कारखाने में कच्चे चमडे़ का शोाधन एवं रंगाई का कार्य होता है। इस कारखाने में निर्मित चमडे़ की वस्तुओं का भारी मात्रा में विदेशों में निर्यात भी होने लगा है। 

जिले में अभी कम्बल बनाने का कार्य कपड़ा बुनने वाले जुलाहों द्वारा किया जाता है। मालपुरा और टोंक में खादी उत्पादन केन्द्रों द्वारा भी अच्छी किस्म के ऊनी कम्बल बनाये जाते हैं। इन कम्बलों की जयपुर और पानीपत में फिनिशिंग की जाती है। जरी, गोटे और सलमे-सितारे जड़ित टोंक के बटुओं ने प्रसिद्धि प्राप्त की है। कपडे़ का सुन्दर छोटा सा पर्स सुपारी, इलायची, तम्बाकू आदि रखने के काम में लिया जाता है। यह कार्य यहां की महिलाओं द्वारा दक्षतापूर्ण किया जाता है। 
जिले की टोडारायसिंह तहसील क्षेत्र की अरावली पहाड़ियों से निकलने वाले पत्थर से चक्की का पाट बनाने का कार्य गुर्जर गौड़ और ब्राह्मण समुदाय के व्यक्तियों द्वारा किया जाता है। चक्की के पाट के अतिरिक्त सिलबट्टे बनाने में भी यहां का पत्थर उपयोगी है। 

राजमहल, बावड़ी इत्यादि स्थानों की खानों में गारनेट प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। यहां से गारनेट बाहर भेजने के बावजूद डिग्गी, मालपुरा और टोंक में गारनेट के मनके बनाने का काम निरन्तर किया जा रहा है। इस व्यवसाय में महिलाओं एवं पुरूषों को अतिरिक्त रोजगार मिलने की संभावनायें हैं। गारनेट के क्षेत्र में भी टोंक जिले का नाम है। 

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