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Download Districts of Rajasthan: Zila Darshan Jhalawar | rasnotes.com

Download Districts of Rajasthan: Zila Darshan Jhalawar


जिला दर्शन: झालावाड़

राजस्थान दक्षिण-पूर्वी सीमान्त जिला झालावाड़ प्रदेश के सांस्कृतिक रूप से समृद्ध जिलों में से एक है। राज्य के हाड़ौती सम्भाग का यह क्षेत्र संस्कृतियों का अनूठा संगम स्थल है। मुगलकाल में झालावाड़ मालवा प्रदेश का हिस्सा था। 

बाद में वहां झाला शासकों ने शैक्षिक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक प्रवृतियों का मार्ग प्रशस्त किया। स्वतंत्र भारत और वृहद् राजस्थान में इस क्षेत्र को मिलाने का कार्य यहां के अन्तिम शासक हरिश्चन्द्र सिंह ने किया। प्राकृतिक, भौगोलिक और खनिज सम्पदा से समृद्ध इस जिले में चरणबद्ध विकास हुआ है।

भौगोलिक स्थिति 

प्राकृतिक सौन्दर्य तथा खनिज सम्पदाओं से समृद्ध विध्याचल पर्वतमालाओं से आवेष्टित यह जिला राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी कोने पर 23*45’20’’ से 24*52’17’’ एवं उत्तरी अक्षांश एवं 75*27’35’’ से 76*56’48’’ पूर्वी देशान्तर के मध्य मालवा पठार के किनारे स्थित है। 

पश्चिम, दक्षिण एवं दक्षिण-पूर्व में मध्यप्रदेश राज्य है। उत्तर-पश्चिम में कोटा जिले की रामगंजमण्डी और सांगोद तहसीलें स्थित है। उत्तर-पूर्व में बारां जिले की अटरू एवं छीपाबड़ौद तहसीलें स्थित है। 
दक्षिणी झालावाड़ में मालवा पठार के सभी गुण विद्यमान है। यह क्षेत्र पहाड़ियों व मैदानों से घिरा हुआ है। झालावाड़ मैदान भवानी मण्डी से पश्चिम में एक लम्बा क्षेत्र है जो पूर्व में असनावर तक फैला है तथा उत्तर-पूर्व एवं दक्षिण में मुकन्दरा पहाड़ियों से घिरा हुआ है। 

यह क्षेत्र उपजाऊ है एवं अच्छे पानी का क्षेत्र है जो आहू, कालीसिंध आदि नदियों एवं छोटे-छोटे अन्य स्त्रोतों से सिंचित है। जिले की नदियों एवं सोते चम्बल से संबंधित है। गंगधार तहसील को छोड़कर बहाव दक्षिण से उत्तर की ओर है। 

सुविधा की दृष्टि से झालावाड़ जिले की नदियां दो समूहों में विभक्त की जा सकती है- पश्चिम समूह व पूर्वी समूह। पश्चिम समूह की नदियां आहू, पिपलाज, क्यासरा, कंताली, रेवा, कालीसिंध एवं चन्द्रभागा है। 

पूर्वी समूह में परवन, अंधेरी, नैवज, धार व उजाड़ नदियां है। आहू, परवन एवं कालीसिंध मुख्य नदियां है। इन समस्त नदियों का प्रारंभ मध्यप्रदेश के मालवा पठार से है। परवन नदी अजनार एवं घोड़ा पछाड़ नदी के संगम से बनी है। 

कालीसिंध, परवन, उजाड़, छापी एवं आहू बारहमासी नदियां है। अन्य नदियां मौसमी है जो बरसात के मौसम के दौरान प्रवाहित होती है। इन नदियों की झालावाड़ जिले में कुल लम्बाई 358 किलोमीटर है। 

जिले में कादिला, मानसरोवर, गोमी सागर, कृष्ण सागर कृत्रिम झीलें हैं। जिल के कुल 38 तालाबों में से 28 तालाब सिंचाई एवं मत्स्य पालन के लिये उपलब्ध है। जिले में मुख्यतया काली मिट्टी 2,87,099 हैक्टर क्षेत्र में पंचायत समिति खानपुर, बकानी एवं पिड़ावा में पाई जाती है। 

दोमट  मध्यम काली मिट्टी, 1,17,115 हैक्टर क्षेत्र में पंचायत समिति झालरापाटन में तथा लोम बरड़ा, लाल मिट्टी पंचायत समिति डग एवं मनोहरथाना क्षेत्र में 28,115 हैक्टर क्षेत्र में उपलब्ध है। 

जलवायु एवं वर्षा 

जिले की जलवायु सामान्यतः शुष्क रहती है। यहां न्यूनतम तापमान 1.0 से 3.0 डिग्री सेंटीग्रेड तथा उच्चतम तापमान 43.0 से 49.0 डिग्री सेंटीग्रेड रहता है। 

न्यूनतम तापमान दिसम्बर, जनवरी तथा उच्चतम तापमान मई-जून माह में होता है। वर्षा बहुधा माह जून के मध्य से प्रारम्भ होकर सितम्बर माह में समाप्त हो जाती है। यहां की सामान्य औसत वर्षा 295 मि.मी. वार्षिक है। 

समुद्र तल से यह जिला न्यूनतम 900 और अधिकतम 1880 फीट ऊंचाई पर स्थित है। जिले में उपलब्ध उपजाऊ काली मिट्टी के आधार पर खरीफ फसल हेतु कपास, ज्वार, सोयाबीन, मक्का, मूंगफली आदि तथा रबी  फसल में गेहूं, धनियां, सरसों, चना एवं अफीम आदि के लिये यहां की भूमि उपयुक्त है। पिछले कुछ वर्षों से यह जिला सन्तरा उत्पादन में भी अच्छी प्रगति कर रहा है। 

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 

झालावाड़ को ’झालाओं की भूमि’ से परिभाषित किया गया है, जो भूतपूर्व झालावाड़ राज्य के शासक वंश में से थे। इस राज्य की कोटा रियासत में से लगभग डेढ़ शताब्दी पूर्व ही उत्पत्ति हुई थी। मुगलकाल में झालावाड़ का अधिकांश क्षेत्र मालवा प्रदेश में सम्मिलित था। चैदह सौ बीस ईसवी में माण्डू के शासकों द्वारा राघवदेव झाला को यह क्षेत्र जागीर में प्राप्त हुआ था। 

झालावाड़ राज्य का क्रमबद्ध इतिहास उपलब्ध नहीं है, लेकिन झाला राजपूत 15वीं शताब्दी में काठियावाड़ के हलबद प्रदेश के एक छोटे से अधिपति राजपरिवार के वंशज माने जाते हैं। इनके नवें उत्तराधिकारी माधोसिंह ने कोटा के महाराव के यहां नौकरी कर ली और अच्छे कार्य करके जागीर  प्राप्त की तथा सेनापति का पद प्राप्त किया। 

माधोसिंह के बाद मदन सिंह उत्तराधिकारी बने और उनके बाद हिम्मत सिंह ने कार्यभार सम्भाला। इनकी मृत्यु के बाद सन् 1780 में जालिम सिंह सेनापति बने। झालावाड़ राज्य के निर्माण में मुख्यतः जालिम सिंह झाला (प्रथम) का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 

इस राज्य का निर्माण 12 अप्रेल, 1838 में अंग्रेजों के साथ की गई एक संधि के परिणामस्वरूप हुआ। इससे पूर्व का झालावाड़ कोटा रियासत का एक हिस्सा था और कुछ हिस्सा मालवा के अधीन था। इसलिये झालावाड़ राज्य का पूर्व इतिहास कोटा राज्य और मालवा सरकार से जुड़ा हुआ है। 

इस राज्य का वास्तविक निर्माण जालिम सिंह के पौत्र झाला मदन सिंह के समय हुआ जिन्होंने सन् 1838 से 1845 तक राज्य किया। इनकी मृत्यु पर पुत्र पृथ्वी सिंह (1845 से 1875) झालावाड़ के दूसरे राजा बने। बाद में राणा भवानी सिंह (1899-1929) ने राज्य में सामाजिक, सांस्कृतिक, प्रशासकीय, सार्वजनिक निर्माण एवं शिक्षा आदि क्षेत्रों में व्यापक सुधार करके झालावाड़ को आधुनिक रूप प्रदान किया। 

उनके आश्रय के कारण झालावाड़ ने देश के उनके क्षेत्रों में उदीयमान व्यक्ति दिये हैं। भवानी सिंह के देहावसान के पश्चात् इनके पुत्र राजेन्द्र सिंह (1929-1943) का राज्याभिषेक  किया गया। अपने पिता की भांति वे भी समाज सुधारक, अच्छे कवि तथा लेखक थे। 

ये सुधाकर उपनाम से कवितायें लिखते थे। इन्होंने सन् 1930 में लन्दन के गोलमेज सम्मेलन भी भाग लिया। इनके पश्चात् राणा हरिश्चन्द्र राजगद्दी पर आसीन हुये। ये झालावाड़ राज्य के अन्तिम शासक थे। सन् 1949 में इन्होंने वृहद् राजस्थान में झालावाड़ राज्य का विलय कराया। 

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् राज्य के निर्माण और संगठन में मिलने का सर्वप्रथम कदम कोटा, डूंगरपुर और झालावाड़ के शासकों द्वारा उठाया गया था। 

बाद में सन् 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के समय मध्यप्रदेश के 77 गांवों सहित एक नगर सुनेल को इस जिले की पिड़ावा तहसील में शामिल किया गया। बाद में कोटा जिले की सांगोद तहसील के 13 गांव भी झालावाड़ जिले की झालरापाटन तहसील में स्थानान्तरित किये गये। 

प्रशासनिक ढांचा 

झालावाड़ जिले में 8 उपखण्ड अकलेरा, मनोहरथाना, खानपुर, पिड़ावा, भवानीमण्डी, असनावर, गंगधार, झालावाड़ हैं। जिले में 12 तहसीलें अकलेरा, असनावर, गंगधार, झालरापाटन, खानपुर, मनोहरथाना, पचपहाड़, पिड़ावा, सुनैल, रायपुर, बकानी और डग है। 

जिले में 8 पंचायत समिति एवं 252 ग्राम पंचायतें हैं। 1 नगर परिषद तथा 5 नगरपालिकायें हैं। 

मेले और त्योहार 

जिले में सभी समुदायों द्वारा अपने पारम्परिक त्योहार बडे़ उत्साह के साथ मनाये जाते हैं। रंग पंचमी, गणगौर, जन्माष्टमी, नवरात्रा, शीतलाष्टमी, देव झूलनी  ग्यारस, शिवरात्रि, तेजादशमी, गणेश चतुर्थी, नाग पंचमी, श्रावणी तीज, होली, दीपावली, आदि त्योहारों के अवसर पर आज भी झालावाड़ के निवासी परम्परागत रूप से सामाजिक, धार्मिक और पारिवारिक अनुष्ठान करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी विभिन्न त्योहारों का मूल स्वरूप अक्षुण्ण है। 

जिले के विभिन्न क्षेत्रों में समय-समय पर अनेक मेलों का आयोजन होता है। जिले में अभी भी हाट परम्परा जीवित है। अलग-अलग क्षेत्रों में इन दिनों भी साप्ताहिक हाट लगते हैं जो किसी छोटे-मोटे मेले की तरह ही होते हैं जिले के अधिकांशतः मेले पशु मेले हैं। 

चन्द्रभागा कार्तिक पशु मेला 

यह जिले का सबसे बड़ा मेला है। कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर यहां झालरापाटन नगर के समीप चन्द्रभागा नदी के किनारे इस मेले का आयोजन पशुपालन विभाग द्वारा किया जाता है। 

हजारों की संख्या में विभिन्न प्रकार के पशुओं की मेले में खरी-फरोख्त होती है और मेला मैदान में एक बड़ा हाट बाजार लगता है। कार्तिक पूर्णिमा के दिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु नर-नारी पावन चन्द्रभागा नदी में स्नान करते हैं। विभागीय रूप से यह मेला 10-12 दिन का होता है, लेकिन लगभग डेढ़ माह तक मेले की रौनक बनी रहती है। 

वैशाख पूर्णिमा गोमती सागर पशु मेला 

कार्तिक पूर्णिमा मेले की भांति ही वैशाख पूर्णिमा के अवसर पर भी झालरापाटन के मेला मैदान मे गोमती सागर पशु मेला लगता है। इस मेले में भी हाट बाजार सजता है और पशुओं की खरी-फरोख्त होती है। 

बसंत पंचमी मेला (भवानी मण्डी-अकलेरा)

बसंत पंचमी के अवसर पर भवानी मण्डी और अकेलेरा नगरपालिकाओं द्वज्ञरा मेले का अयोजन किया जाता है। इन मेलों में किसानों के चेहरे पर फसल पकने का हर्ष और खुशी देखी जा सकती है। इन मेलों में पशुओं की खरीद-फरोख्त होती है। 

वर्ष की दोनों नवरात्राओं में चैमहला कस्बे में एक आकर्षक मेले का आयोजन होता है। विभिन्न अनुष्ठानों के साथ बडे़ पैमाने पर भजन-कीर्तन के साथ देवी की आराधना की जाती है। जिले के कई क्षेत्रों में अब नवरात्रा के अवसर पर गरबा नृत्य के कार्यक्रम भी आयोजित किये जाने लगे हैं। 

शिवरात्रि मेला (मनोहरथाना)

जिले के सीमान्त क्षेत्र मनोहरथाना कस्बे के पास बहने वाली परवन नदी के पाट (बहाव क्षेत्र) में चट्टानों पर एक शिव मंदिर बना है। इस प्राचीन मंदिर पर शिवरात्रि के दिन से भव्य मेले का आयोजन होता है। 

इसके अलावा सुनेल में रामनवमी मेला, क्यासरा मं कालेश्वर महादेव का मेला, खानपुर में ब्राह्मणी मेला, झालावाड़ में राड़ी के बालाजी का मेला, पिड़ावा में हनुमानजी का मेला और मिट्ठेशाह का उर्स (गागरोन) आदि का भी आयोजन होता है। 

कला-संस्कृति एवं साहित्य 

सांस्कृतिक दृष्टि से झालावाड़ जिला हाड़ौती क्षेत्र में अपना विशिष्ट स्थान रखता है। इस जिले में संगीत, नृत्य और अन्य कलाओं की समृद्ध परम्पायें रही हैं। 

विख्यात नर्तक उदयशंकर भट्ट, ख्याति प्राप्त सितार वादक रविशंकर, संगीतज्ञ सोहन सिंह, स्वर साधना के धनी नवलकिशोर, पारम्परिक चित्र शैली के अनूठे कलाकार घासीराम और प्रेमचन्द आदि इस धरती की संस्कृति के वाहक  रहे हैं। 

भवानी सिंह के शासनकाल में यहां विभिन्न कलात्मक प्रवृतियों का विकास हुआ। लगभग 75 वर्ष पूर्व यहां उनके संरक्षण एवं नेतृत्व में नाट्य कला को आश्रय मिला और भवानी नाट्यशाला में अनेक ऐतिहासिक, सामाजिक और शास्त्रीय नाटकों का मंचन हुआ। 

झालावाड़ संग्रहालय में उपलब्ध सैंकड़ों श्रृंखलाबद्ध चित्रों में इस क्षेत्र की समृद्ध चित्रकला का अतीत दिखाई देता है। मूर्तिकला में तो झालावाड़ का इतिहास सजी हो उठता है। ऐसी विविधतापूर्ण कुशल कारीगरी अन्यत्र बहुम कम देखने को मिलती है। जिले की लोक संस्कृति पर आधुनिकता का तुलनात्मक रूप से अभी तक बहुत कम प्रभाव पड़ा है। 

सामान्य रूप से लोगों का पहनावा, खानपान, रहन-सहन, सामाजिक, धार्मिक और पारिवारिक गतिविधियों में अब भी पारम्परिकता झलती है। बिन्दौरी यहां का मुख्य लोक नृत्य है। यह एक गैर शैली का नृत्य है और सामान्यतः होली या विवाह उत्सव पर किया जाता है। घूमर, फंदी, चकरी आदि यहां के अन्य प्रचलित नोक नृत्य है। जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में लोक नाटक और भजन-कीर्तन की परम्परायें अब भी विद्यमान है।

यहां की हस्तकालाओं में चित्रकारी, माण्डणा, मूर्तिकला, मिट्टी के खिलाने, लकड़ी पर खराद कार्य, पटवों की कला, आभूषण कला, बसेड़ों की कला आदि मुख्य है। 

साहित्य के क्षेत्र में भी झालावाड़ का गौरवपूर्ण अतीत रहा है। यहां साहित्य समिति झालावाड़, राजस्थान हिन्दी साहित्य सिद्धान्त, झालरापाटन, हिन्दी साहित्य समिति आदि संस्थाओं ने साहित्यिक सृजन के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया है। 

खनिज संसाधन 

झालावाड़ जिले में मुख्यतः इमारती पत्थर की खाने हैं। यहां तांबा, कच्चा लोहा, कैलसाइट, ब्राॅक्साइट, डोलोमाइट, लाइमस्टोन, सेंडस्टोन आदि खनिज पंचपहाड़ और डग क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। ’कोटा स्टोन’ के नाम से विख्यात बालू पत्थर के अलावा लैटराइट, बेन्टोनाइट के भण्डार भी जिले में हैं। 

दर्शनीय स्थल 

प्राकृतिक पहाड़ियों से घिरे तत्कालीन झालावाड़ राज्य में स्थापत्य एवं भवन निर्माण कला तथा विभिन्न ललित कलाओं का समुचित विकास हुआ है।  

पुरातत्व संग्रहालय 

महाराजा भवानी सिंह द्वारा सन् 1915 में स्थापित संग्रहालय यहां के पैलेस के मुख्य द्वार के पास स्थित है। अनेक ऐतिहासिक और दुर्लभ प्रतिमाओं, शिलालेखों, चामुण्डा, षटमुखी सूर्य नारायण, अर्द्धनारीश्वर, शूकर वराह और त्रिमुखी विष्णु की आकर्षक मूर्तियां विशेष रूप से दर्शनीय है। संग्रहालय में प्रदर्शित विभिन्न कलात्मक और आकर्षक वस्तुओं से झालावाड़ के गौरवशाली समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास की झलक मिलती है। 

गढ़ भवन 

पुरातत्व और भवन निर्माण कला की दृष्टि से यह गढ़ दर्शनीय है। इसका निर्माण सन् 1838 में झाला राजा मदन सिंह द्वारा कराया गया था। गढ़ का शीश महला आकर्षक है। इसके एक हिस्से में बने राजाओं के चित्र अभी भी अपने चटख रंगों के कारण खूबसूरत लगते हैं। अन्य भिति चित्रों में रामायण के दृश्य, कृष्णरासलीला, श्रीनाथजी की पूर्ण श्रृंगार युक्त राजभोग झांकी देखते ही बनती है। 

रैन बसेरा

झालावाड़-कोटा मार्ग पर सात कि.मी. दूर किशन सागर झील के किनारे पर लकड़ी से बना हुआ एक अत्यन्त सुन्दर विश्रामगृह है, जो रैन बसेरा के नाम से जाना जाता है। देहरादून के वन शोध संस्थान द्वारा निर्मित इस अनूठे भवन का सन् 1936 में लखनऊ की एक उद्योग प्रदर्शनी में रखा गया था। झालावाड़ के तत्कालीन महाराजा इस भवन को खरीद कर यहां ले आये और किशन सागर के किनारे इसको स्थापित करवाया। 

भवानी नाट्यशाला 

यह नाट्यशाला राज्य में ही नहीं बल्कि देश भर में अनूठी है। सन् 1921 में कला प्रेमी महाराज भवानी सिंह द्वारा बनवाई गई यह नाट्यशाला पारसी  ओपेरा शैली की है। इसमें तीन मंजिला दर्शक दीर्घा और भव्य रंगमंच आकर्षक है। यहां हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू और संस्कृत के अनेक नाटकों का मंचन किया गया है। 

गागरोन का किला 

यह किला झालावाड़ शहर से पांच कि.मी. दूर उत्तर-पूर्व में एक लम्बी पहाड़ी पर स्थित है। इस किले के पास ही चोडे़ पाट की दो बड़ी नदियों-काली सिंध और आहू का संगम होता है। पूरा किला  बिना किसी नींव के सीधे चट्टानों पर खड़ा किया गया है। सामरिक दृष्टि से किले की स्थिति ऐसी है कि दो-तीन कि.मी. दूर से पता ही नहीं चलता कि यहां कोई किला भी है। किले के तीन ओर बहने वाली नदियां भी इसे अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करती हैं। 

सीधी खड़ी लम्बी-चैड़ी दीवारों और उन पर बने गुम्बदों से घिरा यह किला निर्माण कला का अनूठा उदाहरण है। किले के पास ही मिट्ठे शाह की ऐतिहासिक दरगाह है। यहां प्रति वर्ष उर्स का आयोजन होता है। 

नवलखा किला

झालावाड़ के झालरापाटन की ओर जाने वाली सड़क के बायीं ओर की एक पहाड़ी पर यह किला स्थित है। इसके नाम से ही निर्माण पर किये गये खर्च का अनुमान लग जाता है। इस किले का निर्माण कार्य झाला पृथ्वी सिंह ने सन् 1860 में प्रारम्भ कराया था लेकिन यह पूरा नहीं हो सका। 

चन्द्रावती 

झालरापाटन शहर के दक्षिण में पौराणिक नगर चन्द्रावती के ध्वस्त अवशेष हैं। पावन चन्द्रभागा नदी के किनारे स्थित इस वैभवशाली नगर का निर्माण मालवा के राजा चन्द्रसेन द्वारा कराया गया था। कुछ बचे हुये मंदिर आज भी इस क्षेत्र के समृद्ध इतिहास की गौरव गाथा कह रहे हैं। यहां से प्राप्त अनेक देवी-देवताओं की आकर्षक और दुर्लभ प्रतिमायं झालावाड़ संग्रहालय में सुरक्षित हैं। चन्द्रभागा नदी के किनारे स्थित शीतेश्वर महादेव, काली देवी, शिव, विष्णु और बराह के मंदिर समूह विशेष रूप से दर्शनीय है। 

सूर्य मंदिर 

झालरापाटन शहर के बीचों-बीच बने इस मंदिर को सात सहेलियों का मंदिर और पद्मनाथ मंदिर भी कहा जाता है। कर्नल टाॅड  ने इसे चारभुजा मंदिर कहा है। खजुराहों मंदिर शैली में बना यह विशाल मंदिर अपनी भव्यता और सुन्दर कारीगरी के कारण मशहूर है। इसमें गर्भगृह, अन्तराल और मण्डप बने हुये हैं। मण्डप पर 96 फीट ऊंचा शिखर बना हुआ है। अन्तराल की दीवारें और मण्डप के खम्भे बहुत खूबसूरत हैं। मण्डप का प्रवेश द्वार तोरण के आकार का है। दसवीं शताब्दी के इस मंदिर के पृष्ठ भाग मे  बनी सूर्य की मूर्ति घुटनों तक जूते पहने हुये है जबकि मंदिर के भीतर विष्णु की मूर्ति प्रतिष्ठापित है। 

शांतिनाथ जैन मंदिर 

यह मंदिर भी सूर्य मंदिर शैली का है। पूर्वाभिमुख इस मंदिर के गर्भ गृह में काले रंग के पत्थर की आदमकद दिगम्बर जैन प्रतिमा है। इस मंदिर की भव्यता तथा साज-सज्जा भी आकर्षक है। 

अतिशय क्षेत्र - चांदखेड़ी

यह राज्य का एक विरल अतिशय क्षेत्र है। यहां के आदिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर की रचना रहस्मयी है। जिला मुख्यालय से लगभग 35 कि.मी. दूर खानपुर कस्बे में स्थित इस मंदिर के भूगर्भ में एक विशाल तल प्रकोष्ठ है, जिसमें संवत् 512 की श्री आदिनाथ भगवचान की पद्मासन प्रतिमा प्रतिष्ठित है। यहां अष्ट प्रतिहार्य युक्त महावीर स्वामी की प्रतिमा भी विराजमान है। दोनों प्रतिमायें भारतीय मूर्तिकला का असाधारण नमूना है। 

मनोहरथाना का किला 

परवन और काली खाड़ नदियों के संगम पर बना यह किला ऐतिहासिक एवं सामरिक महत्व का स्थल रहा है। किले का आन्तरिक भाग बहुत प्राचीन है, किन्तु बाहरी भाग भीम सिंह द्वारा बनवाया गया था। झालावाड़ जिला मुख्यालय से यह किला लगभग 90 कि.मी. दूर है। 

बौद्धकालीन गुफायें 

झालावाड़ के दक्षिण में स्थित डग पंचायत समिति क्षेत्र में कई स्थानों पर पत्थरों के विशाल खण्डों को काटकर बनाई गई गुफायें और स्तूप हैं। क्यासरा गांव से 5 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम की ओर पहाड़ की चोटी पर 35 कोलवी गुफायें बनी है। इनमें से अधिकांश गुफायें अब खत्म सी हो गई है। 

अब यहां पांच खण्ड है जिसमें तीन स्तूप और दो मंदिर के आकार में हैं। आवर गांव के पूर्व में भी पहाड़ी को काटकर बुद्ध की गुफायें बनाई गई हैं। गुफाओं की अतिरिक्त चट्टानों को काटकर यहां मंदिर बनाये गये हैं। ये भिन्न-भिन्न आकार के हैं। 

इसमें सभी की छतें सीधी है। पगारिया ग्राम के दक्षिण में हाथिया गौड़ पहाड़ी पर भी पांच गुफायें हैं जिनकी छतें गोलाकार हैं। इसी प्रकार गुनाई नामक ग्राम के नजदीक दक्षिण दिशा में चार बौद्धकालीन गुफायें हैं, जो कोलवी और विनायका के समकालीन मानी गई हैं।

नागेश्वर पार्श्वनाथ

राजस्थान और मध्यप्रदेश की सीमा के पास चौमहला से लगभग नौ किलोमीटर दूर उन्हेल गांव में नागेश्वर पाश्र्वनाथ तीर्थ स्थल है। यहां प्रतिष्ठित प्रतिमा लगभग ढाई हजार साल पुरानी भगवान पाश्र्वनाथ के मूल शरीर के अनुसार ग्रेनाइट सेन्डस्टोन से बनाई गई है। 
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